सोमवार, 15 दिसंबर 2025

प्रेरणादायक कहानी, सफलता की कहानी,



🚀 सफलता की ओर: अमित और इत्तिका की प्रेरणादायक कहानी





अमित और इत्तिका बचपन के गहरे दोस्त थे। दोनों का घर एक-दूसरे से सटा हुआ था, और उनकी दोस्ती उनकी शैतानी और सपनों की तरह अटूट थी। जहाँ अमित एक शांत और अंतर्मुखी (Introvert) लड़का था, जो किताबों और जटिल समीकरणों में खोया रहता था, वहीं इत्तिका ऊर्जा से भरपूर, मुखर और कलात्मक (Energetic and Artistic) थी, जिसे स्टेज और कैमरे से प्यार था। उनके व्यक्तित्व में जमीन-आसमान का अंतर था, लेकिन उनका साझा सपना उन्हें एक सूत्र में बांधता था: जीवन में कुछ बड़ा हासिल करना।





🎯 लक्ष्य का निर्धारण और पहला झटका

जब वे कॉलेज में पहुँचे, तो दोनों ने अपने-अपने लक्ष्य तय किए। अमित ने अंतरिक्ष विज्ञान (Space Science) में जाने का फैसला किया, जिसका रास्ता कठिन प्रवेश परीक्षाओं से होकर गुजरता था। इत्तिका ने मास कम्युनिकेशन (Mass Communication) को चुना, जहाँ प्रतियोगिता बहुत भयंकर थी।

अमित ने अपना पहला बड़ा प्रवेश परीक्षा दी, और परिणाम निराशाजनक रहा। वह सफलता (Success) के पास आकर चूक गया। उसका आत्मविश्वास चकनाचूर हो गया। दूसरी ओर, इत्तिका को अपने कॉलेज के पहले ही साल में एक प्रतिष्ठित मीडिया हाउस में इंटर्नशिप मिली, जिससे उसकी प्रसिद्धि (Fame) तेज़ी से बढ़ने लगी।

अमित को लगा कि वह इत्तिका से पीछे छूट रहा है। उसने खुद को कमरे में बंद कर लिया और तैयारी से दूरी बना ली।

🌟 इत्तिका की प्रेरणा और आत्मविश्वास की वापसी

एक शाम, इत्तिका अमित के कमरे में आई। उसने देखा कि अमित की मेज पर धूल जमी है और उसकी किताबें बंद पड़ी हैं।

"अमित," इत्तिका ने प्यार से कहा, "तुम अपनी सबसे बड़ी ताकत को क्यों भूल रहे हो? तुमने हमेशा मुझे सिखाया है कि असफलता सिर्फ एक परिणाम (Failure is just a result) है, चरित्र नहीं। क्या तुम भूल गए कि महान वैज्ञानिक बनने के लिए सिर्फ बुद्धि (Intelligence) नहीं, बल्कि दृढ़ता (Perseverance) भी चाहिए?"

इत्तिका ने उसे याद दिलाया कि वह बचपन से ही हर चुनौती का सामना करने वाला योद्धा रहा है। उसने उसे एक महान वैज्ञानिक का उदाहरण दिया जिसने कई बार असफलता देखी थी, लेकिन कभी हार नहीं मानी। इत्तिका ने कहा, "सफलता की कहानी (Motivational Story) लिखने के लिए एक बार गिरना ज़रूरी है। तुम्हारा सफर अभी खत्म नहीं हुआ है, अमित! इसे अपनी प्रेरणा (Motivation) बनाओ।"

इत्तिका के इन शब्दों ने अमित के अंदर सोए हुए आत्मविश्वास (Self-Confidence) को जगा दिया। उसने अपने पुराने शेड्यूल को फिर से अपनाया, लेकिन इस बार दुगनी मेहनत और बेहतर रणनीति के साथ।

🏆 संघर्ष और जीत: सपनों की उड़ान

अगले एक साल तक, दोनों ने अपने-अपने क्षेत्रों में अद्भुत समर्पण (Dedication) दिखाया। अमित सुबह 4 बजे उठकर पढ़ाई करता, और इत्तिका देर रात तक शूटिंग या एडिटिंग में लगी रहती। वे एक-दूसरे से अपने लक्ष्यों के बारे में बात करते, एक-दूसरे की छोटी-छोटी सफलताओं का जश्न मनाते और एक-दूसरे के डर को दूर करते। उनकी सच्ची दोस्ती (True Friendship) उनके लिए सबसे बड़ा सहारा थी।

आखिरकार, वह दिन आया। अमित ने देश की सबसे कठिन प्रवेश परीक्षा में टॉप रैंक (Top Rank) हासिल की और अपने सपनों के संस्थान में प्रवेश पाया। ठीक उसी महीने, इत्तिका ने अपनी पहली शॉर्ट फिल्म (Short Film) पूरी की, जिसने एक अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ डेब्यू पुरस्कार (Best Debut Award) जीता।

दोनों ने एक-दूसरे को गले लगाया, उनकी आँखों में खुशी के आँसू थे। उन्होंने साबित कर दिया था कि सही मार्गदर्शन (Guidance) और अटूट मेहनत (Hard Work) से कोई भी सपना पूरा किया जा सकता है।


🙏 नैतिक संदेश (Moral of the Story)

"आपकी सफलता की राह में आपकी दोस्ती और आपके अपनों का समर्थन आपकी सबसे बड़ी पूँजी है। असफलता केवल एक रुकावट है, अंत नहीं। अपने लक्ष्य से नज़र मत हटाओ और याद रखो कि सच्चा आत्मविश्वास हमेशा सबसे बड़ी प्रेरणा होता है।

रविवार, 14 दिसंबर 2025

वह एक गलती जो 99% लोग सफलता मिलने से ठीक पहले करते हैं: एक सीख"

Motivational Story in Hindi", 

"Preranadayak Kahani", 

"Safalta ka rahasya"


क्या आपने कभी किसी प्रोजेक्ट, रिश्ते या सपने पर जी-तोड़ मेहनत की है, लेकिन परिणाम (Result) बिल्कुल "जीरो" मिला? अगर हाँ, तो आप अकेले नहीं हैं। सच तो यह है कि शायद आप अपनी सफलता के बिल्कुल करीब खड़े हैं।


एक बार की बात है, एक पुराने गांव में एक पत्थर तोड़ने वाला (Stonecutter) रहता था। वह अपनी ताकत के लिए नहीं, बल्कि अपने धैर्य के लिए जाना जाता था।


एक दिन, उसे एक बहुत बड़ी और सख्त चट्टान को तोड़ने का काम मिला। वह चट्टान इतनी मज़बूत थी कि गाँव के कई मज़दूर उसे तोड़ने की कोशिश में अपने औज़ार तोड़ चुके थे।


पत्थर तोड़ने वाला उस विशाल काली चट्टान के सामने खड़ा हुआ। उसने गहरा साफ़ लिया, अपना भारी हथौड़ा उठाया और पूरी ताकत से चट्टान पर मारा।


*ठनन!*


आवाज़ गूंजी, लेकिन चट्टान पर एक खरोंच भी नहीं आई। वह चट्टान वैसी की वैसी खड़ी थी, मानो उस पर कोई असर ही न हुआ हो।


उसने फिर से वार किया। फिर एक और बार। और फिर एक बार।


घंटे दिनों में बदल गए। गाँव वाले उसे देखने के लिए जमा हो गए। वे आपस में फुसफुसाने लगे, "यह पागल है। यह अपना समय बर्बाद कर रहा है। यह पत्थर कभी नहीं टूटेगा।"


दसवें दिन तक, वह उस पत्थर पर **लगातार 100 वार** कर चुका था।

नतीजा? कुछ भी नहीं। न कोई दरार, न कोई टुकड़ा। चट्टान बिल्कुल वैसी ही थी जैसी पहले दिन थी।


### हार मानने का पल


अब वह थक चुका था। उसके हाथों में छाले पड़ गए थे और पीठ दर्द से कराह रही थी। उसके मन में संदेह (Doubt) घर करने लगा।


*"शायद लोग सही कह रहे हैं,"* उसने सोचा। *"शायद मेरी मेहनत बेकार जा रही है।"*


उसने अपना हथौड़ा नीचे रख दिया। वह वहां से जाने ही वाला था कि उसे अपने पिता की एक पुरानी सीख याद आ गई: **"पत्थर आखिरी चोट से नहीं टूटता, वह पहली चोट से ही टूटना शुरू हो जाता है।"**


उसने एक आखिरी बार अपना हथौड़ा उठाया। अपनी सारी हताशा, सारी थकान और अपनी बची-खुची उम्मीद को समेटकर उसने हथौड़ा हवा में लहराया और पूरी ताकत से दे मारा।


**उसने 101वां वार किया।**


*कड़क!*


इस बार आवाज़ अलग थी। एक हल्की सी दरार पत्थर के बीच में उभरी और देखते ही देखते वह विशाल चट्टान दो टुकड़ों में बंट गई।


### 101वीं चोट का रहस्य


गाँव वाले हैरान रह गए। उन्होंने तालियाँ बजाईं और कहा, "कमाल है! इस एक चोट ने इतने बड़े पत्थर को तोड़ दिया!"


**लेकिन वे गलत थे।**


उस पत्थर को 101वीं चोट ने नहीं तोड़ा था।

उसे उस पहली चोट ने तोड़ा था। और दसवीं ने। और पचासवीं ने।


हर बार जब वह हथौड़ा पत्थर पर लग रहा था, तो बाहर से भले ही कुछ न दिख रहा हो, लेकिन अंदर से पत्थर की बनावट कमज़ोर हो रही थी। वह अपनी जगह छोड़ रहा था। प्रगति **अदृश्य (Invisible)** थी, लेकिन हो रही थी।


### सीख (Moral of the Story)


ज़िंदगी में हमारी मेहनत अक्सर उस पत्थर पर वार करने जैसी होती है।


* आप जिम जाते हैं, लेकिन शरीर नहीं बदलता।

* आप ब्लॉग लिखते हैं, लेकिन ट्रैफिक नहीं आता।

* आप पैसे बचाते हैं, लेकिन फिर भी अमीर महसूस नहीं करते।


आप अभी "अदृश्य चरण" (Invisible Phase) में हैं। आप पत्थर पर चोट मार रहे हैं। सिर्फ इसलिए कि आपको अभी 'दरार' (Result) नहीं दिख रही, इसका मतलब यह नहीं है कि आप आगे नहीं बढ़ रहे।


**अपना हथौड़ा मत छोड़िए।** हो सकता है कि आप 99वें वार पर हों, और आपकी सफलता बस 100वें वार का इंतज़ार कर रही हो।


> **"सफलता कोई घटना नहीं है, यह उन हज़ारों अदृश्य प्रयासों का परिणाम है जो एक दिन अचानक दुनिया के सामने आते हैं।"**



शनिवार, 25 अक्टूबर 2025

जो होता है अच्छा होता है

 

 मृत्यु के देवता ने अपने एक दूत को भेजा पृथ्वी पर। एक स्त्री मर गयी थी, उसकी आत्मा को लाना था। 



देवदूत आया, लेकिन चिंता में पड़ गया। क्योंकि तीन छोटी-छोटी लड़कियां जुड़वां–एक अभी भी उस मृत स्त्री से लगी है। एक चीख रही है, पुकार रही है। एक रोते-रोते सो गयी है, उसके आंसू उसकी आंखों के पास सूख गए हैं–तीन छोटी जुड़वां बच्चियां और स्त्री मर गयी है, और कोई देखने वाला नहीं है। पति पहले मर चुका है। परिवार में और कोई भी नहीं है। इन तीन छोटी बच्चियों का क्या होगा?


उस देवदूत को यह खयाल आ गया, तो वह खाली हाथ वापस लौट गया। उसने जा कर अपने प्रधान को कहा कि मैं न ला सका, मुझे क्षमा करें, लेकिन आपको स्थिति का पता ही नहीं है। तीन जुड़वां बच्चियां हैं– छोटी-छोटी, दूध पीती। एक अभी भी मृत से लगी है, एक रोते-रोते सो गयी है, दूसरी अभी चीख-पुकार रही है। हृदय मेरा ला न सका। क्या यह नहीं हो सकता कि इस स्त्री को कुछ दिन और जीवन के दे दिए जाएं? कम से कम लड़कियां थोड़ी बड़ी हो जाएं। और कोई देखने वाला नहीं है।


मृत्यु के देवता ने कहा, तो तू फिर समझदार हो गया; उससे ज्यादा,..... जिसकी मर्जी से मौत होती है, .......जिसकी मर्जी से जीवन होता है!


    तो तूने पहला पाप कर दिया, और इसकी तुझे सजा मिलेगी। और सजा यह है कि तुझे पृथ्वी पर चले जाना पड़ेगा। और जब तक तू तीन बार न हंस लेगा अपनी मूर्खता पर, तब तक वापस न आ सकेगा।


इसे थोड़ा समझना। तीन बार न हंस लेगा अपनी मूर्खता पर–क्योंकि दूसरे की मूर्खता पर तो अहंकार हंसता है। जब तुम अपनी मूर्खता पर हंसते हो तब अहंकार टूटता है।


 देवदूत को लगा नहीं। वह राजी हो गया दंड भोगने को, लेकिन फिर भी उसे लगा कि सही तो मैं ही हूं। और हंसने का मौका कैसे आएगा? 


उसे रूस की जमीन पर फेंक दिया गया। 


एक चमार, सर्दियों के दिन करीब आ रहे थे और बच्चों के लिए कोट और कंबल खरीदने शहर गया था, कुछ रुपए इकट्ठे कर के। जब वह शहर जा रहा था तो उसने राह के किनारे एक नंगे आदमी को पड़े हुए, ठिठुरते हुए देखा।


 यह नंगा आदमी वही देवदूत है जो पृथ्वी पर फेंक दिया गया था।


 उस चमार को दया आ गयी। और बजाय अपने बच्चों के लिए कपड़े खरीदने के, उसने इस आदमी के लिए कंबल और कपड़े खरीद लिए।


 इस आदमी को कुछ खाने- पीने को भी न था, घर भी न था, छप्पर भी न था जहां रुक सके। तो चमार ने कहा कि अब तुम मेरे साथ ही आ जाओ। लेकिन अगर मेरी पत्नी नाराज हो–जो कि वह निश्चित होगी, क्योंकि बच्चों के लिए कपड़े खरीदने लाया था, वह पैसे तो खर्च हो गए–वह अगर नाराज हो, चिल्लाए, तो तुम परेशान मत होना। थोड़े दिन में सब ठीक हो जाएगा।


उस देवदूत को ले कर चमार घर लौटा। न तो चमार को पता है कि देवदूत घर में आ रहा है, न पत्नी को पता है। जैसे ही देवदूत को ले कर चमार घर में पहुंचा, पत्नी एकदम पागल हो गयी। बहुत नाराज हुई, बहुत चीखी- चिल्लायी। और देवदूत पहली दफा हंसा। चमार ने उससे कहा, हंसते हो, बात क्या है? उसने कहा, मैं जब तीन बार हंस लूंगा तब बता दूंगा।


देवदूत हंसा पहली बार, क्योंकि उसने देखा कि इस पत्नी को पता ही नहीं है कि चमार देवदूत को घर में ले आया है, जिसके आते ही घर में हजारों खुशियां आ जाएंगी। लेकिन आदमी देख ही कितनी दूर तक सकता है! पत्नी तो इतना ही देख पा रही है कि एक कंबल और बच्चों के पकड़े नहीं बचे। जो खो गया है वह देख पा रही है, जो मिला है उसका उसे अंदाज ही नहीं है–मुफ्त! घर में देवदूत आ गया है। जिसके आते ही हजारों खुशियों कश्रो,नंंक्या घट रहा है!


जल्दी ही, क्योंकि वह देवदूत था, सात दिन में ही उसने चमार का सब काम सीख लिया। और उसके जूते इतने प्रसिद्ध हो गए कि चमार महीनों के भीतर धनी होने लगा। आधा साल होते-होते तो उसकी ख्याति सारे लोक में पहुंच गयी कि उस जैसा जूते बनाने वाला कोई भी नहीं, क्योंकि वह जूते देवदूत बनाता था। सम्राटों के जूते वहां बनने लगे। धन अपरंपार बरसने लगा। एक दिन सम्राट का आदमी आया। और उसने कहा कि यह चमड़ा बहुत कीमती है, आसानी से मिलता नहीं, कोई भूल-चूक नहीं करना। जूते ठीक इस तरह के बनने हैं। और ध्यान रखना जूते बनाने हैं, स्लीपर नहीं। क्योंकि रूस में जब कोई आदमी मर जाता है तब उसको स्लीपर पहना कर मरघट तक ले जाते हैं। चमार ने भी देवदूत को कहा कि स्लीपर मत बना देना। जूते बनाने हैं, स्पष्ट आज्ञा है, और चमड़ा इतना ही है। अगर गड़बड़ हो गयी तो हम मुसीबत में फंसेंगे।


 लेकिन फिर भी देवदूत ने स्लीपर ही बनाए। 


जब चमार ने देखे कि स्लीपर बने हैं तो वह क्रोध से आगबबूला हो गया। वह लकड़ी उठा कर उसको मारने को तैयार हो गया कि तू हमारी फांसी लगवा देगा! और तुझे बार-बार कहा था कि स्लीपर बनाने ही नहीं हैं, फिर स्लीपर किसलिए? देवदूत फिर खिलखिला कर हंसा।


 तभी आदमी सम्राट के घर से भागा हुआ आया। उसने कहा, जूते मत बनाना, स्लीपर बनाना। क्योंकि सम्राट की मृत्यु हो गयी है।


भविष्य अज्ञात है। सिवाय उसके और किसी को ज्ञात नहीं। और आदमी तो अतीत के आधार पर निर्णय लेता है। सम्राट जिंदा था तो जूते चाहिए थे, मर गया तो स्लीपर पर चाहिए।


 तब वह चमार उसके पैर पकड़ कर माफी मांगने लगा कि मुझे माफ कर दे, मैंने तुझे मारा। पर उसने कहा, कोई हर्ज नहीं। मैं अपना दंड भोग रहा हूं। लेकिन वह हंसा आज दुबारा। चमार ने फिर पूछा कि हंसी का कारण? उसने कहा कि जब मैं तीन बार हंस लूं…।


दुबारा हंसा इसलिए कि भविष्य हमें ज्ञात नहीं है। इसलिए हम आकांक्षाएं करते हैं जो कि व्यर्थ हैं। हम अभीप्साएं करते हैं जो कभी पूरी न होंगी। हम मांगते हैं जो कभी नहीं घटेगा। क्योंकि कुछ और ही घटना तय है। हमसे बिना पूछे हमारी नियति घूम रही है। और हम व्यर्थ ही बीच में शोरगुल मचाते हैं। चाहिए स्लीपर और हम जूते बनवाते हैं। मरने का वक्त करीब आ रहा है और जिंदगी का हम आयोजन करते हैं। तो देवदूत को लगा कि वे बच्चियां! मुझे क्या पता, भविष्य उनका क्या होने वाला है? मैं नाहक बीच में आया।


और तीसरी घटना घटी कि एक दिन तीन लड़कियां आयीं जवान। उन तीनों की शादी हो रही थी। और उन तीनों ने जूतों के आर्डर दिए कि उनके लिए जूते बनाए जाएं। एक बूढ़ी महिला उनके साथ आयी थी जो बड़ी धनी थी। देवदूत पहचान गया, ये वे ही तीन लड़कियां हैं, जिनको वह मृत मां के पास छोड़ गया था और जिनकी वजह से वह दंड भोग रहा है। वे सब स्वस्थ हैं, सुंदर हैं। उसने पूछा कि क्या हुआ? यह बूढ़ी औरत कौन है? उस बूढ़ी औरत ने कहा कि ये मेरी पड़ोसिन की लड़कियां हैं। गरीब औरत थी, उसके शरीर में दूध भी न था। उसके पास पैसे-लत्ते भी नहीं थे। और तीन बच्चे जुड़वां। वह इन्हीं को दूध पिलाते-पिलाते मर गयी। लेकिन मुझे दया आ गयी, मेरे कोई बच्चे नहीं हैं, और मैंने इन तीनों बच्चियों को

पाल लिया।


 अगर मां जिंदा रहती तो ये तीनों बच्चियां गरीबी, भूख और दीनता और दरिद्रता में बड़ी होतीं। मां मर गयी, इसलिए ये बच्चियां तीनों बहुत बड़े धन-वैभव में, संपदा में पलीं। और अब उस बूढ़ी की सारी संपदा की ये ही तीन मालिक हैं। और इनका सम्राट के परिवार में विवाह हो

रहा है।


देवदूत तीसरी बार हंसा। और चमार को उसने कहा कि ये तीन कारण हैं। भूल मेरी थी। नियति बड़ी है। और हम उतना ही देख पाते हैं, जितना देख पाते हैं। जो नहीं देख पाते, बहुत विस्तार है उसका। और हम जो देख पाते हैं उससे हम कोई अंदाज नहीं लगा सकते, जो होने वाला है, जो होगा। मैं अपनी मूर्खता पर तीन बार हंस लिया हूं। अब मेरा दंड पूरा हो गया और अब मैं जाता हूं।


तुम अगर अपने को बीच में लाना बंद कर दो, तो तुम्हें मार्गों का मार्ग मिल गया। फिर असंख्य मार्गों की चिंता न करनी पड़ेगी। 


         छोड़ दो उस पर। वह जो करवा रहा है, जो उसने अब तक करवाया है, उसके लिए धन्यवाद। जो अभी करवा रहा है, उसके लिए धन्यवाद। जो वह कल करवाएगा, उसके लिए धन्यवाद। तुम बिना लिखा चेक धन्यवाद का उसे दे दो। वह जो भी हो, तुम्हारे धन्यवाद में कोई फर्क न पड़ेगा। अच्छा लगे, बुरा लगे, लोग भला कहें, बुरा कहें, लोगों को दिखायी पड़े दुर्भाग्य या सौभाग्य, यह सब चिंता तुम मत करना।     


गुरुवार, 3 अगस्त 2023

भगवान के घर देर है अंधेर नहीं

 जब भी हम अकेले होते हैं, अनायास ही हमें ईश्वर याद आ जाता है। डॉक्टर भी मरीज को बचाने के सारे प्रयास करने के बाद कहता है, सब कुछ ऊपर वाले के हाथ में है। यकीन कीजिए वह ऊपर वाला बहुत शक्तिशाली है और वह अपने बन्दों को खुश देखना चाहता है। उन्हें उनके कार्य का उचित परिणाम देना चाहता है। उसके दरबार में देर तो हो सकती है परंतु अंधेर नहीं है। बस वो इंतजार करता है कि आप पूरी तन्मयता से कार्य करें।


भगवान भी कर्म वीरों को चाहता है 




एक गांव में बाढ़ आई थी। लोग जान बचाने के लिए घर की छत पर चढ़े हुए थे। एक व्यक्ति छत पर चढ़कर लगातार भगवान को याद कर रहा था। वह धार्मिक प्रवृत्तियों में गहरी आस्था रखने वाला व्यक्ति था। पानी बढ़ता जा रहा था। इतने में वहां एक नाव आई, दूसरे लोगों ने उसे नाव में आने के लिए आवाज लगाई।

उसने जवाब दिया - नहीं, मेरी तो प्रभु रक्षा करेंगे और वह नाव आगे निकल गई। फिर थोड़ी देर बाद एक और नाव आई, फिर से लोगों ने उससे कहा - जल्दी आ जाओ, बहुत जल्दी पानी तुम्हारी छत तक पहुंच जाएगा। उसने जवाब दिया मुझे कुछ नहीं होगा, मुझे तो भगवान जरूर बचाएंगे। और पानी लगातार बढ़ रहा था, अब छत पर भी पानी पहुंचने लगा था। इतने में एक हेलीकॉप्टर आया, उसमें सवार एक व्यक्ति ने रस्सी फेंकी और उसे पकड़कर हेलीकॉप्टर में आने को कहा। उस व्यक्ति ने जवाब दिया - नहीं, मुझे तो भगवान बचाएंगे।

हेलीकॉप्टर से आवाज आई, कुछ ही मिनटों में तुम्हारी छत डूब जाएगी, जल्दी आओ। उसने मना कर दिया और उसके बाद कुछ ही देर में पानी में डूब कर मर गया। मरने के बाद ऊपर वाले के पास पहुंचा। वह बहुत क्रोधित था। उसने भगवान से कहा - मैंने जीवन भर आपकी भक्ति की और जब मैं मर रहा था, आप मुझे बचाने नहीं आए। भगवान ने कहा - मूर्ख भक्त, तेरे घर जो दो नाव और हेलीकॉप्टर आए थे, उन्हें मैंने ही भेजा था। अब तु खुद ही नहीं बचना चाहेगा तो तुझे कौन बचा सकता है। मैंने तुझे तीन बार बचने के रास्ते दिए, लेकिन तू स्वयं बचने के लिए कर्म नहीं करेगा तो मैं भी तेरी कोई मदद नहीं कर सकता।

जीवन में मुश्किलें और कठिनाइयां तो आएंगी ही, ऐसे वक्त में ऊपर वाले को याद करना लेकिन पूरी ताकत से कर्म करना क्योंकि ऊपर वाला भी कर्म वीरों को ही चाहता है। जो लोग अपनी असफलताओं और नाकामियों को भाग्य या भगवान की इच्छा के नाम पर छुपाते हैं, वे जीवन भर ऐसे ही रह जाएंगे क्योंकि ऊपर वाला भी कर्म वीरों की ही पुकार सुनता है।

गुरुवार, 15 जून 2023

जो चाहिए वो बांटो

जिंदगी बूमरैंग की तरह होती हैं, आपका किया हुआ व्यवहार घूमकर आपके पास आता है, आपके कहे हुए शब्द घूमकर आपके पास आते हैं, आप जो भी दुनिया को देते हैं वह आपके पास कई गुना होकर लौट आता है इसीलिए-"जैसा व्यवहार अपने साथ चाहते हैं वैसा ही व्यवहार दूसरों को दीजिए।"



क्योंकि आप जो बोएंगे, वही आप को काटना पड़ेगा। जो भी चीज आप सबसे ज्यादा चाहते हैं, उसे सबसे ज्यादा बांटिए। आप चाहते हैं दूसरी आप की मुश्किलों में मदद करें तो आप उनकी मुश्किलों में उनके साथ खड़े रहिए। यदि आप दूसरों को श्रेय देंगे तो आपको भी पलट कर श्रेय मिलेगा। यदि आपको सम्मान पसंद है तो दिल खोल कर दूसरों का सम्मान कीजिए। यदि आप दूसरों का तिरस्कार करेंगे तो बदले में आपको वही वापस मिलेगा। यदि आप दूसरों की दिल से प्रशंसा करेंगे तो बदले में वही पाएंगे जीवन का यह बेहद सरल सिद्धांत है परंतु फिर भी अधिकांश लोग इसे अमल में नहीं लाते।

जीतने का सबसे सरल रास्ता है कि आप दूसरों को उनकी जीत में मदद करें। यदि आप जीतना चाहते हैं तो दूसरों की सफलता के हितेषी बनिए। यदि आप प्रेम पाना चाहते हैं तो प्रेम बांटिए।

एक पिता अपने नन्हे पुत्र के साथ पर्वत पर चल रहा था। अचानक पुत्र गिर पड़ा, चोट लगने पर जोर से चिल्लाया - आह ह ह ह ह.... । अचानक वह चौक पड़ा क्योंकि पहाड़ से वैसी ही आवाज लौट कर आई - " आह ह ह ह ह "



आश्चर्यचकित हो उसने पूछा - कौन हो तुम

पहाड़ों से आवाज फिर से आई - कौन हो तुम

पुत्र चिल्लाया - मैं तुम्हारा दोस्त हूं।

आवाज लौटी - मैं तुम्हारा दोस्त हूं।

किसी को सामने आते ना देख कर पुत्र ने गुस्से में कहा - तुम कायर हो।

आवाज लौटी - तुम कायर हो।

पुत्र अचरज में पड़ गया, उसने पापा से पूछा - यह क्या हो रहा है।

पापा ने कहा - अब यहां सुनो।

वे जोर से चिल्लाए - तुम चैंपियन हो।

पहाड़ों से आवाज लौटी - तुम चैंपियन हो।

भी जोर से चिल्लाए - हम तुमसे प्यार करते हैं।

आवाज लौटी - हम तुमसे प्यार करते हैं।

बच्चा आश्चर्यचकित था, उसे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि यह क्या हो रहा है। उसके पिता ने तभी उसे जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढ़ाया - बेटा, लोग इसे इको कहते हैं लेकिन यही जिंदगी है। जिंदगी में जो भी आपको मिलता है, वह आपका ही कहा हुआ या किया हुआ होता है। जिंदगी सिर्फ आपके कार्यों का आईना होती है। यदि अपनी टीम से श्रेष्ठता की उम्मीद करते हैं तो खुद में श्रेष्ठता लाइए, यदि आप दूसरों से समय की पाबंदी की उम्मीद करते हैं, तो खुद पाबंद होइए, यदि आप दूसरों से प्यार चाहते हैं तो दिल खोलकर प्यार कीजिए। यह सिद्धांत जीवन के हर क्षेत्र में लागू होगा, जिंदगी वह हर चीज आपको लौट आएगी जो आपने दी है।

यदि आपकी बातों से आपके साथ के लोग थोड़ा बेहतर महसूस करते हैं, खुश होते हैं, प्रफुल्लित होते हैं, आपके साथ समय गुजार कर अच्छा महसूस करते हैं, तो वे आपके प्रशंसक बनेंगे और आवश्यकता होने पर आपके काम आएंगे।

दो मित्र एक रेगिस्तान में चल रहे थे। किसी बात पर दोनों में विवाद हो गया और एक ने दूसरे को थप्पड़ मार दिया। थप्पड़ खाने वाले मित्र के दिल को बहुत चोट पहुंची। उसने कुछ नहीं कहा और रेत पर लिखा, आज मेरे सबसे अच्छे दोस्त ने मुझे थप्पड़ मारा। कुछ देर बाद उन्हें पानी की झील मिली। दोनों उसमें नहाने उतर गए। अचानक जिसने थप्पड़ खाया था, वहां पानी में डूबने लगा। उसे तुरंत उसके थप्पड़ मारने वाले मित्र ने जान पर खेलकर बचा लिया। इस पर पहले मित्र ने एक चट्टान पर लिखा - आज मेरे सबसे अच्छे मित्र ने मुझे डूबने से बचाया। दूसरे मित्र ने उसे थप्पड़ को रेत पर और बचाने को चट्टान पर लिखने का कारण पूछा।



मित्र ने जवाब दिया - जब कोई अपना हमें चोट पहुंचाए तो उसे रेत पर लिखना चाहिए ताकि वह तुरंत मिट जाए और जब कोई भला करे तो उसे चट्टान पर लिखना चाहिए ताकि वह मिट ना सके व हमेशा याद रहे।

इसलिए दोस्तों जिंदगी में जो भी आप पाना चाहते हैं, वही बांटिए। आज से प्रेम, सम्मान, श्रेय, क्षमा बांटना शुरू कीजिए देखिए आपकी लोकप्रियता का ग्राफ कितनी तेजी से बढ़ता है।

शुक्रवार, 7 अप्रैल 2023

कछुआ और खरगोश नया संस्करण 8 सीख

 कछुआ और खरगोश की कहानी हम सब बचपन से सुनते आ रहे हैं। सच कहूं तो यह प्रेरणा देने की बजाय बहुत से लोगों को बोर करती हैं। लेकिन मैं इस कहानी के नए संस्करण को पेश कर रहा हूं। जिस तरह से बिल गेट्स हर बार विंडोस के नए संस्करण पेश करते हैं, ठीक उसी तरह। इस कहानी में ढेर सारे कीमती सूत्र छिपे हैं और नए संस्करण में कछुआ और खरगोश आज के जमाने के सूत्र पेश करते नजर आते हैं, ऐसे सूत्र जो आपको जीवन में सफलता की राह दिखाएंगे।

कछुए और खरगोश में रेस हुई। खरगोश ने सोचा कि यह सुस्त कछुआ क्या दौड़ेगा। खरगोश अति आत्मविश्वास में कुछ दूर दौड़ कर सो गया और कछुआ धीरे-धीरे चलते-चलते मंजिल पर पहुंच गया, यह है पुराना संस्करण

कहानी की पहली सीख


सार यह है कि जीतता वह है जो लगातार पूर्ण समर्पण से कार्य करता है, ठीक उस कछुए की तरह


आप ऐसे कई से फटी हुई या अन्य लोगों को जानते होंगे जिनकेबारे में आपने कभी सोचा भी नहीं होगा कि वह तरक्की करेंगे लेकिन आज से समृद्धि के शिखर पर हैं। उसके विपरीत कुछ ऐसे लोग भी होंगे इनकी सफलता आप तय मानते थे परंतु वे आम जीवन जी रहे हैं।

खरगोश कौम सालों से शर्मिंदा थी, वे मुंह उठाकर चल नहीं पाते थे। छुप-छुपकर जंगलों में रहते थे ताकि कोई उनका मजाक ना उड़ा दे। एक दिन खरगोशों ने अपना उनका बदला लेने का निश्चय किया। खरगोशों ने कछुए को ललकारा, परंतु अब कछुए ने दौड़ने से इनकार कर दिया क्योंकि कछुआ चतुर था, दूर की सोच रहा था।

कहानी की दूसरी सीख

एक बार शक्तिशाली शत्रु हार जाए तो भी अभिमान मत करना क्योंकि किस्मत हर बार मेहरबान नहीं होती और शत्रु हर बार त्रुटि नहीं करेगा।

खरगोश कौम ने भारी जुगाड़ लगाया, कोर्ट केस किया, हड़तालें की, जन समर्थन जुटाया और कछुए को मजबूर कर दिया फिर से दौड़ने के लिए।

बुद्धिमान कछुए ने शर्त रखी कि इस बार दौड़ का मार्ग मैं तय करूंगा। खरगोश तैयार हो गए। नियत समय पर दौड़ शुरू हो गई। खरगोश ने सोचा कि मार्ग तय करने से क्या होगा, आखिर काम तो गति ही आएगी। बड़े बेमन से कछुआ दौड़ने को तैयार हुआ परंतु कछुए ने जबरदस्त दिमाग दिखाते हुए रेस का रास्ता ऐसा बनाया कि उसके बीच में एक पानी का नाला पड़ता था।

कहानी की तीसरी सीख

जब कोई काम करना तय हो जाए तो अपनी खूबियों को ध्यान में रखते हुए रणनीति बनाओ।



खरगोश ने इस बार शपथ ली थी कि चाहे जो हो जाए, रास्ते में नहीं रुकूंगा। खरगोश तेजी से दौड़ा। दौड़ते-दौड़ते, अचानक खरगोश हक्का-बक्का रह गया जब उसने सामने पानी भरा नाला देखा। उसने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि कछुआ इतनी बुद्धिमानी भरी चाल चल सकता है। फिर से हार और अपमान की कल्पना करके खरगोश अंदर तक हिल गया। निराश, हताश और सुन्न खरगोश के मुंह से शब्द फूटने बंद हो गए।

कहानी की चौथी सीख

कभी भी दुश्मन या लक्ष्य को कमजोर या मूर्ख मत समझो। यदि आप चाल चल सकते हो तो वह भी चल सकता है।

खरगोश हक्का-बक्का होकर नाले के किनारे बैठ गया क्योंकि उसे तैरना नहीं आता था। इतने में कछुआ वहां पहुंचा और खरगोश को देख कर मुस्कुराया। खरगोश की शर्मिंदगी से झुकी पलकें हार स्वीकार कर चुकी थी। इतने में दोनों को चौंकाते हुए शेर वहां आ पहुंचा। उसे कुछ भी माजरा मालूम नहीं था। उसने तुरंत कछुए और खरगोश से कहा कि तुम दोनों मेरे साथ दौड़ लगाओ नहीं तो मैं तुम्हें खा जाऊंगा। एक छोटी सी दौड़ के कारण तुम्हारी कहानियां हर मंच पर बोली जाती हैं और हर पुस्तक में छापी जाती हैं। अब इस कहानी में तुम्हारी जगह मैं आना चाहता हूं।

कछुए और खरगोश ने निर्णय लिया कि बिना दौड़े मरने से अच्छा है, दौड़ कर जीतने का प्रयास करना।

कहानी की पांचवी सीख

जब मुश्किल सामने हो तो हौसला हारकर समर्पण करने से अच्छा है, आखरी दम तक संघर्ष करना। कौन जाने कब स्थिति पलट जाए।

खरगोश और कछुए ने कहा- महाराज हम तो छोटे हैं, आपके सामने हमारी कोई हैसियत नहीं है इसलिए दौड़ का मार्ग हमें चुनते दें। शेर ने हिकारत से कहा- ठीक है।

पुनः दौड़ पुरानी जगह से शुरू हुई। नाले तक कछुआ खरगोश की पीठ पर बैठकर तेजी से आया। नाले पर खरगोश कछुए की पीठ पर बैठ गया। खरगोश को लेकर कछुआ चुपचाप तैरता हुआ निकल गया और शेर किनारे पर अपनी हार पर आगबबूला होता रहा क्योंकि शेर इतना शक्तिशाली होते हुए भी तैरने की योग्यता नहीं रखता।

कहानी की सीख

६) कोई बड़ा या तेज है इसका अर्थ या नहीं कि वही जीतेगा।

७) जब शत्रु शक्तिशाली हो तो टीम बनाकर मुकाबला करो।

८) यदि आपकी कमी दूसरे की खूबी हो और दूसरे की कमी आपकी खूबी हो तो इससे अच्छी जोड़ी और नहीं हो सकती।

इन जबरदस्त सूत्रों को आप अपनी जिंदगी में उतार कर अपनी सफलता का प्रतिशत बढ़ा सकते हैं और अपने लक्ष्यों को पा सकते हैं। यह कहानियां सिर्फ चेहरे पर दो पल की मुस्कान देने के लिए नहीं होती, इनका लक्ष्य होता है आप को और बेहतर बनाना। संसार में ज्ञान बहुत से रूपों में बिखरा पड़ा है, यदि आप ज्ञान लेने के लिए तैयार नहीं है तो इनका मूल कौड़ी का भी नहीं है।







गुरुवार, 14 जुलाई 2022

क्या आपके पास भी टाइम नहीं है

 हमें कुछ लोगों की क्षमता और प्रतिभा पर बेहद विश्वास होता है । हमें पूरा यकीन होता है कि वह व्यक्ति जीवन में जरूर सफल होगा । कुछ महीनों या सालों के बाद जब उस व्यक्ति पर पुनः गौर करते हैं तो उसे असफल या औसत जिंदगी बिताते हुए देखकर हैरानी होती है मन में कई तरह के सवाल उठते हैं कि आखिर सब कुछ होते हुए भी वह व्यक्ति असफल क्यों हो गया?

उपलब्धियां कार्य करने से हासिल होती हैं , यदि आप पूरी लगन से अपनी क्षमता को कार्य करने में नहीं लगाएंगे तो ढेर सारे गुण होते हुए भी आप आम ही रह जाएंगे । इसीलिए सिर्फ प्रतिभा, योग्यता और क्षमता होना सफलता की गारंटी नहीं है।

मैंने बहुत से लोगों को क्षमतावान होते हुए भी सुनहरे अवसर को खोते हुए देखा है । केवल अपने बहानों से वे अपनी विफलता को ढक कर रखते हैं । टाइम नहीं है, बिजी था , सांस लेने की फुर्सत नहीं है, जो लोग ये लाइनें इस्तेमाल करते हैं , वे लोग बिना कार्य के व्यस्त लोग होते हैं।

आम भारतीयों में टालने की जबरदस्त प्रवृत्ति होती है । हम हर रोज काम को टालते हैं । वह काम धीरे-धीरे इमरजेंसी बन जाता है । हमें उसका तनाव झेलना पड़ता है । और उसके लिए अतिरिक्त धन भी खर्च करना पड़ता है । इस आलस और टालमटोल से गैर जरूरी काम जमा हो जाते हैं । और इनके चक्कर में जरूरी काम छूट जाते हैं। आप भी बहुत से ऐसे लोगों को जानते होंगे , जो हमेशा व्यस्तता का बहाना करते हैं लेकिन हकीकत में सबसे ज्यादा खाली समय उन्हीं के पास होता है।

जरा ठंडे दिमाग से एक नजर अपनी दिनचर्या पर डालिए , कहीं आप भी तो समय व्यर्थ करने और टालमटोल की प्रकृति का शिकार तो नहीं है। ऐसे ढेर सारे कार्य हैं जिनमें हम रोज समय व्यर्थ करते हैं । जैसे ज्यादा देर से उठना ,अनावश्यक टीवी देखना , बिना बात के तर्क वितर्क करना , ज्यादा मोबाइल पर बात करना , जहां आवश्यकता ना हो वहां भी ज्ञान सिद्द्ध करना , निंदा करना , जो समस्याएं अस्तित्व में नहीं है उन पर भी चिंता करना और स्वयं का गुणगान करना।

लेकिन अधिकांश लोग अपनी आदतों तथा दिनचर्या पर गौर नहीं करते । पहले मुझे भी समय की कमी बहुत महसूस होती थी । फिर मैंने अपनी दिनचर्या पर गौर किया तो शुरुआत में लगा कि मैं जरा भी समय व्यर्थ नहीं गंवाती हूं । फिर पुनः गहराई से बार बार सोचा तो मेरी दो मुख्य गलतियां सामने आई। मैं मोबाइल पर अधिक बात करती हूं तथा मैं बहस में बढ़-चढ़कर भाग लेती हूं । फिर मन में विचार आया कि मैं किसी भी बहस में मुफ्त की सलाह बांट देती हूं । कुछ देर तक तो बहस में जीतने की खुशी होती है । ज्ञानी का लेबल लग जाता है । परंतु बाद में उस हारे हुए व्यक्ति के साथ रिश्तो में दरार आ जाती है । और समय भी खराब होता है। मैंने उसी क्षण निर्णय लिया कि अब बिना परिणाम की बहस नहीं करूंगी और साथ ही मोबाइल पर सिर्फ आवश्यकतानुसार ही बात करूंगी । अब हर रोज 45 मिनट मेरे पास अतिरिक्त रहते हैं जिनमें कई और कार्य हो जाते हैं।

यदि आपके काम भी अधूरे छूटते हैं आपको भी काम भूलने की आदत है तो आप 1 महीने तक रोज के कार्य लिखें और जो कार्य पूरे होते जाएं उन्हें काट दें। जो काम करना जरूरी हो उन्हें तुरंत करें और जिन्हें नहीं करना हो उनके लिए "ना" कहना सीखे। "ना" सुनकर एक बार दूसरों को बुरा लग सकता है लेकिन मैं दूसरी बार वे आपका समय नष्ट नहीं करेंगे। हर रात सोने से पहले अगले दिन के कार्यक्रम को अपनी डायरी में लिखे । इससे आपको टालमटोल या बहानेबाजी नहीं करनी पड़ेगी। यदि आप किसी अति महत्वपूर्ण कार्य में व्यस्त नहीं है और कोई कार्य याद आए तो उसे तुरंत करें उसे बाद के लिए ना टालें ।

मित्रों ,रोज के छोटे-छोटे कार्यों में टालमटोल करेंगे तो बड़े कार्य नहीं कर पाएंगे । मुझे उम्मीद है कि आप समय व्यर्थ करके और काम टालकर अपने भविष्य और सपनों के साथ विश्वासघात नहीं करेंगे।


प्रेरणादायक कहानी, सफलता की कहानी,

🚀 सफलता की ओर: अमित और इत्तिका की प्रेरणादायक कहानी अमित और इत्तिका बचपन के गहरे दोस्त थे। दोनों का घर एक-दूसरे से सटा हुआ था, और उनकी दोस्...